Sunday, 31 July 2011

सूरज जी

सूरज जी  तुम !
 इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो !!


लगता तुमको नींद न आती
और न कोई काम तुम्हें
ज़रा नहीं भाता क्या मेरा
बिस्तर पर आराम तुम्हें

ख़ुद तो जल्दी उठते ही हो‚ मुझे उठाते हो
सूरज जी तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो !!



कब सोते हो‚ कब उठ जाते
कहाँ नहाते-धोते हो
तुम तैयार बताओ हमको
कैसे झटपट होते हो
लाते नहीं टिफ़िन‚
क्या खाना खा कर आते हो !
सूरज जी तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो !!


रविवार आफ़िस बन्द रहता
मंगल को बाज़ार भी
कभी-कभी छुट्टी कर लेता
पापा का अख़बार भी
ये क्या बात‚ तुम्हीं बस छुट्टी नहीं मनाते हो !
सूरज जी तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो !!

है चाहता बस मन तुम्हें

-कृष्ण शलभ
शीतल पवन, गंधित भुवन
आनन्द का वातावरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

शतदल खिले भौंरे जगे
मकरन्द फूलों से भरे
हर फूल पर तितली झुकी
बौछार चुम्बन की करे
सब ओर मादक अस्फुरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

संझा हुई सपने जगे
बाती जगी दीपक जला
टूटे बदन घेरे मदन
है चक्र रतिरथ का चला
कितने गिनाऊँ उद्धरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

नीलाभ जल की झील में
राका नहाती निर्वसन
सब देख कर मदहोश हैं
उन्मत्त चाँदी का बदन
रसरंग का है निर्झरण
सब कुछ यहाँ बस तुम नहीं
है चाहता बस मन तुम्हें

Monday, 25 July 2011